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चाँद, बादल और शाम
तख़लीक़-ए-नज़र

रहोगे उदास तुम भी इसी तरह

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रहोगे उदास तुम भी इसी तरह
गर प्यार हुआ तुम्हें मेरी तरह

जुदाई के दिन मर-मरके काटूँ
भली बात करता है वो बुरी तरह

फ़िराक़1 में बेचैनी न विसाल2 में सुकूँ
आराम नहीं इस दिल को किसी तरह

ग़ालियाँ देते हो तुम कितने प्यार से
बात तो हो तुमसे चाहे इसी तरह

तबाह हूँ तो चर्ख़3 की मरज़ी से हूँ
क़हर बरपे हैं हमपे कई तरह

आशिक़ों ने सहें हैं सितम माशूक़ के
मगर कौन था जाँ-बलब4 मेरी तरह

शब्दार्थ:
1. बिछोह, separation, 2. मिलन, intimacy, 3. आसमान,ईश्वर, Sky, God, 4. जिसके होंटो पर जान हो
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लेखन वर्ष: २००४
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तख़लीक़-ए-नज़र | गुलाबी कोंपलें

19 टिप्पणियाँ

फिराक में बेचैनिया न विसाल में सुकून
आराम नहीं इस दिल को किसी तरह
बहुत सुन्दर !


kitni shiddat se pyar kiya hoga ,
ki janab ka ye haal hua hoga ....


gazal ka har sher lajawaab hai.......kis kis
ki tarif karun.


सुन्दर ग़ज़ल है।
बहुत दिनों बाद ब्लॉग पर आये हो।
आनन्द आ गया पढ़कर।


विनय भाई.. बड़े दिनों के बाद नज़र आये....

बेहतरीन नज़्म


bahut umda likha hai rahoge udaas ............wah vinay bahut achcha likh rahe ho,.................mere karya ka kya kiya , samay nahin mila kya................?


बहुत बढ़िया गजल है।हर शेर बहुत जोरदार है।आनंद आ गया।


Ummeed kartee hun,ki, aapke oopar ye sitam zindagee na dhaye..kabhi koyi kahar naa barpe..


बहुत सुंदर गजल जी, लेकिन इतने दिन कहा छुपए रहे भाई


bahut din baad dikhe kya khoob tewar hain majaaa gayaa... bdhaaye vinay ji


arsh


pyaar ke saath dukh ka gahra sambandh hai....bahut hi sukshm tarike se bataya


HAR SHER ALAG KAHAANI KAHTA HAI VINAY JI ...... BAHOOT SAMAY BAAD AANA HUVA .... KAISE HAIN AAP ...


bahut umda. goya jafar ke jameen ki ghazal arse baat padh kar sukun aa ya.
aapke pichle posts ki tarah hi behtareen.
satya


follow karna chata tha
but frind list kahi dikhi hi nahi .


bhaiya...
achhi ghazal hai..
aapki itni saari ghazal dekh kar to yahi kahunga ki ek book publish kar ke dhamaaka kar dijiye...


... बेहद प्रभावशाली व प्रसंशनीय अभिव्यक्ति !!!!



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