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times readएक नया सवाल-सा उठता है
हमें ख़ुद रंज आप-से आता है
क्यों सुकूँ दम-ब-दम घटता है
रात नींद नहीं आती देर तक
नब्ज़-नब्ज़ लम्हा कटता है
किताबों में लिखते हैं तेरा नाम जो
वो कब मिटाये से मिटता है
तुझे निकालना चाहता हूँ दिल से
तो दिल से दिल और सटता है
इश्क़ से तो नहीं हूँ मैं वाक़िफ़
दिल को शोला-सा कुछ लिपटता है*
*यह शे’र मिर्ज़ा रफ़ी ‘सौदा’ का है
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लेखन वर्ष: २००४



















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तख़लीक़-ए-नज़र | गुलाबी कोंपलें