()
times readगर सही भी करते हैं तो ग़लत करते हैं
तुमको बतायेगा कौन ख़ुदा भी पत्थर है
जी को लगाते हैं तुमसे’ ग़लत करते हैं
तुम अपने नाज़ से न फिरोगे हम ख़ुद से
नाज़ उठाते हैं तुम्हारा ग़लत करते हैं
इश्क़ में जलकर ख़ाक़ हो जायेंगे हम
हम जलते हैं इश्क़ में ग़लत करते हैं
करते हैं ग़ैर से अपने दिल का हाल बयाँ
जान-बूझकर काम ये ग़लत करते हैं
तुमको चीरकर अपना दिल दिखा देंगे
‘नज़र’ हम जो करते हैं ग़लत करते हैं
---
लेखन वर्ष: २००४



















'मेरी ग़ज़ल' के बारे में आपका क्या ख़्याल है?
आपका चिट्ठे पर पधारने एवं प्रतिक्रिया करने के लिए सच्चे मन से धन्यवाद!
मेरी अन्य विधाएँ पढ़ने के लिए इन पृष्ठों को भी देखें।
तख़लीक़-ए-नज़र | गुलाबी कोंपलें