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चाँद, बादल और शाम
तख़लीक़-ए-नज़र

वो जिसे इश्क़ कहता था

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वो जिसे इश्क़ कहता था वाइज़1 हम उसमें फँस गये
बहाये इतने आँसू कि जहाँ खड़े थे वहीं धँस गये

न जिगर से लहू बहा न लब तक अपनी बात आयी
गिरियाँ2 दिल ही में बादल बने वहीं बरस गये

रह-रहके रूह छोड़ना चाहती थी इस ज़ोफ़3 बदन को
इतना चाहते हैं तुम्हें कि मरने तक को तरस गये

कोई पढ़ दे मेरा नसीब हमको क्या-क्या बदा4 है
हमें लगता है हम जहाँ-जहाँ भी गये अबस5 गये

किस तरह से भूलें तुमको किस तरह से भुलायें
दिल, जान, ख़्याल और तस्व्वुर6 में तुम बस गये

दिल लिया तुमने ग़म नहीं बारहा7 जान क्यों लेते हो
फिर गुज़रे सामने से और फिर मुझपे हँस गये

शब्दार्थ:
1. धर्मोपदेशक, 2. आँसू, 3. कमज़ोर, 4. निश्चित, 5. व्यर्थ, 6. याद, 7. बार-बार
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तख़लीक़-ए-नज़र | गुलाबी कोंपलें

27 टिप्पणियाँ

बेहतरीन रचना .......जिसमे एहसास ही एहसास है......बधाई


bhut hi khubsurat andaaj...

regards


बहुत खूबसूरत


bahut sundar blog aur usse bhi sundar gazal


न जिगर से लहू ही बहा न लव तक अपनी बात आयी
गिरियाँ दिल ही मे बादल बने यही बरस गये
लाजवाब आपकी हर गज़ल ही खूबसूरत होती है मगर ये गज़ल तो लाजवाब है बधाई


गज़ल का लफ्ज कब रबा है कहानी सच्ची,
मेघ भी छाये,और बरसे बिना निकल गये।।

खूबसूरत नज्म के लिए बधाई!


gahri bhavnayein sanjoye hai.


achchhi gazal -- shandar


wo jise ishq kehta raha
hum usi par to mar gaye

aapne bahut hi achha likha hai. Ek ek shabd itne saleeke se piroya hua hai. ise pad kar hamari purani yaadein phir se taazaa ho gayi.


-Sheena
http://sheena-life-through-my-eyes.blogspot.com
http://hasya-cum-vayang.blogspot.com/
http://mind-bulb.blogspot.com/


bahot hi khubsurat shabdon se banaayee hai aapne is khubsurat rachanaa ko bahot bahot badhaayee


arsh


Wow..simlpy loved it...too good...each & every line is too much...Mere Dil Ke Aar-Par...


बहुत ही सुंदर लिखे हो भाई, बहुत ही अच्छी लगी आप की यह गजल.
धन्यावद


सारे आशार दिल को छू जाते है...........


आपकी ग़ज़ल के भाव बहुत ही भावुक और दिल को छू लेने वाले है.

अब बार बार आना होगा इस बज़्म पर.


बहुत ही सुन्दर ग़ज़ल है मगर आपका कोई भी ब्लॉग बहुत मुश्किल से खुल रहा है, कुछ तकनिकी प्रोब्लम है या पता नही...

रह-रह के रूह छोड़ना चाहती थी इस ज़ोफ़ बदन को
इतना चाहते हैं तुम्हे की मरने तक को तरस गये... बहुत ही सुन्दर!


हस शेर काबिले तारीफ है ......... पूरी ग़ज़ल लाजवाब है


vinay ji,

bahut sundar, last line to bahut hi khubsoorat hain.

mere problem solve nahi ho paai. mere yahoo ID par plz mail kar de agar time ho to plz.


... बेहतरीन गजल, बधाई !!!


ख़ूबसूरत एहसास के साथ लिखी हुई आपकी ग़ज़ल बहुत अच्छा लगा!


अपने सभी पाठकों का मैं तहे-दिल से शुक्रिया अदा करता हूँ!


waah waah
wo jise ishk kahta tha waaiz ham usmein fans gaye
bahaye itne aansoo ke jahan khade the wahin dhans gaye
bahut khoob...
laajwaab..
behtareen..


भीग के इस मौसम में उमंगें बेखुदी में है खोई, जैसे सावन की इन बूंदों में शराब मिला रहा है कोई...



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