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चाँद, बादल और शाम
तख़लीक़-ए-नज़र

अगर आँख रोये और दिल सिसकियाँ भरे

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अगर आँख रोये और दिल सिसकियाँ भरे
तो भला बोलो आशिक़ ऐसे में क्या करे

इक वो दिन था इक ये आज का दिन है
मर्ज़ी ख़ुदा की ज़ख़्म भर दे या हरा करे

तुमको मतलब नहीं आशिक़ की नज़र से
चाहे तुम्हें देख के वो सौ आहें भरा करे

तुम रहो बुत की तरह से पत्थर-दिल
और मेरा दिल तेरे लिए धड़का करे

आग जो है तेरे हुस्न की शरर1 से है
शरर क्यों जलाये मुझको क्यों जला करे

बेचैनियाँ देके तुम मुझको ख़ुश रहते हो
हो जाये तुम्हें भी इश्क़ ख़ुदा करे

शब्दार्थ:
1. चिंगारी, fire spark

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लेखन वर्ष: २००४
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तख़लीक़-ए-नज़र | गुलाबी कोंपलें

26 टिप्पणियाँ

बहुत ही सुन्दर ...........बधाई


हो जाए तुम्हें इश्क खुदा करें... यही तो हर आशिक सोचता है अपनी उस प्रेयसी के लिए जिसे वह दिलो जान से चाहता है। बहुत अच्छी गजल है, बधाई


waah..bhai kya baat hai,
sundar gajal aur aapke sundar bhav bhi,
bahut bahut badhayi..


बहुत अच्छी गजल है | देखते है प्यार क्या क्या रंग दिखाता है


tun raho but ki tarah...achche word hain sahbdon ki rachnaa bhi ...abhaar


एक बहुत ही सुंदर रचना
धन्यवाद


सबसे पहले धन्यबाद मेरा Follower बनने के लिये
न मै कवि न शायर पर मेरे विचाए से सुन्दर गजल


हमको तो चाँद ने ज्वाला सी जलन ही दी है।
और चन्दन ने फकत दिल मे अगन सी दी है।।
ऐसे हालात में गंगा में क्यों ना डूब मरें।
जख्म ऐसे हैं दिये, आज तलक हैं वो हरे।।

सुखनवर को सुन्दर गज़ल के लिए बधाई!


हो जाये तुहें भी इश्क खुदा करे..क्या प्रयोग किया है..दुआ बददुआ -कौन जाने,,, पर वाह!! बहुत खूब!


लाजवाब gazal है ........... लाजवाब शेर हैं....


बहुत ही उम्दा... जनाब आप ऐसे शब्द/ख्यालात लाते कहाँ से हैं ??


खुबसुरत......भावो से भरी सुंदर नज़्म..

regards


विनय जी,

यह दुआ जो आखिरी शेर में दी है, बहुत अच्छी है।

हो जाये तुम्हें भी इश्क खुदा करे

मुकेश कुमार तिवारी


कितना खूबसूरत अंदाज़ है आपके लिखने का ,मुबारक हो


आपका सवाल जायज है। पर इसका जवाब तो रूलाने वाले से पूछा जाना चाहिए।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }


हमेशा की तरह बहुत लाजवाब गज़ल है बधाई


Mai itnee saaree tippaneeniyon ke baad kya kahun?
Aapki har rachna,har pankti anupmey hoti hai, naye alfaaz kahan se laaoon?

http://shamasansmaran.blogspot.com

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तुम रहो बुत की तरह.....बहुत सुन्दर एवं दर्दीलीहैं हर पंक्तियाँ


... बहुत सुन्दर, अंतिम शेर लाजबाव है !!!!!


vinay ji, bahut hi lajawaab sher hai! Pata nahin kyon lekin abhi bhi mein gulabi kople mein tipanni daal nahin paa rahi hoon!


आप सभी सुधी पाठकों का धन्यवाद!



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