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चाँद, बादल और शाम
तख़लीक़-ए-नज़र

मोहब्बत ने सदा की तो

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मोहब्बत ने सदा की तो दुनिया का डर निकल गया
बदन में साँसों का बुझा हुआ इक चराग़ जल गया

बे-दर्द के दिल में दर्द का असर यूँ देखा आज
मेरे इक आँसू की गर्मी से उसका दिल पिघल गया

तेरे रूप को बेसुध तकता रहा मैं बरसों तक
इस हुस्न के आगे हर ख़ुर्शीदो-माह ढल गया

तेरी आँखों ने फ़िज़ा को जाने किस अदा के साथ देखा
चार-सू बेज़ार-सा एक मौसम बहार में बदल गया

तेरे प्यार की छाँव ने मुझे सहारा इस तरह दिया
कि तेरी ख़ुशी का साया मेरे हर ग़म को छल गया

बड़ी बेताबी थी आठों पहर कश्मकश का समा था
तेरे मुस्कुराने भर से ही बेताब दिल बहल गया

ग़ालिब से कहो जाकर उसने सच कहा था इक रोज़
'नज़र' के दिमाग़ में भी पड़ इश्क़ का ख़लल गया

शब्दार्थ:
ख़ुर्शीदो-माह: सूरज और चाँद, सदा: पुकारना

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लेखन वर्ष: २००४
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तख़लीक़-ए-नज़र | गुलाबी कोंपलें

28 टिप्पणियाँ

क्या बात है..बहुत खूब!!!


बहुत लाजवाब गज़ल है बहुत बहुत बधाई


आपकी मोहब्‍बत में हम भी खिंचे चले आए।

गजल पढी, कमेण्‍ट दिया और फिर बाए बाए।

-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }


bahut hi badhiya.......aapake shero ka koee jabaab nahi hota hai....bahut khub


बेहतरीन, बहुत खूब, बहुत पहले लिखी गई रचना।


विनय जी,बहुत बढिया गज़ल लिखी है।बधाई।


bahut umda rachna ke liye badhai.


sanson ka bujha ek chirag jal gaya...
mere ek aansun...
urdun ka bhut gyan to nahi hai...phir bhi, pad kar kuchh alag aur bahut khoob kahane ko man karata hai...


इस बेहतरीन गजल के लिये आप का धन्यवाद


एक शे'र है जानाब बशीर बद्र का ...

गुफ्तगू उनसे रोज होती है ,मुद्दतों सामना नहीं होता..

वही हाल कर दिया है आपने ये चाँद बादलों में क्यूँ इतने दिनों के लिए छुप जाता है ...
बहोत ही खुबसूरत भाव की ग़ज़ल कही है आपने... ढेरो बधाई


अर्श


लाजवाब कर दिया आपने

...बहुत खूब


लाजवाब ग़ज़ल है विनय जी.............. गालिब का ज़िक्र भी खूबसूरती से किया है .बहूत खूब


... प्रभावशाली गजल, प्रसंशनीय अभिव्यक्ति !!!!


अपने सभी सुधी पाठकों का तहे-दिल से शुक्रिया


बहुत ख़ूबसूरत ग़ज़ल लिखा है आपने जो काबिले तारीफ है! बेहतरीन ग़ज़ल के लिए बहुत बहुत बधाई!


bahut hi sundar ghazal. dhanybaad.


बबली जी, रविकांत जी, मौदगिल जी, प्रेम जी आप वेब्लॉग पर पधारे रचना सराही आपका शुक्रिया


Waah. Bahut khoob. Kai dinon baad aana hua aapke blog par. Padhkar Dil khush ho gaya. Badhai sweekaren.


ter muskurane bhar se beetaab dil bahal gaya ..

inteha ...sundar samayojan shabdon ka


bhale hi 2004 ki likhi ho kintu ab bhi mouzu he..
bahut achhi rachna/ aap kamaal ki rachanaye karte he../
badhaai


वाह बहुत खूबसूरत ग़ज़ल है.


अच्छी अभिव्यक्ति


Vah bahut achchhee gajal...


अपने सभी पाठकों का एक बार पुन: धन्यवाद!



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