()
times readवरगना दम तोड़ देंगे मर जायेंगे
तुमने जो कहा तो मर भी जाना है हमको
जन्नत में न लगा जी तो किधर जायेंगे
इश्क़ में बहुत सीमाब है दिल मेरा
कितना सहेंगे हम हद से गुज़र जायेंगे
तुम हो ख़ुश्बू और मैं मानिन्दे-गुल हूँ
तुम नहीं हो तो हम टूटकर बिखर जायेंगे
तुम मान लो मेरी बात को सच वगरना
साबित कर देने को हम ज़हर खायेंगे
जो तुमको चाहा है हमने पूरे दिल से
तुम नहीं आते इधर तो हम उधर आयेंगे
---
लेखन वर्ष: २००४



















'मेरी ग़ज़ल' के बारे में आपका क्या ख़्याल है?
आपका चिट्ठे पर पधारने एवं प्रतिक्रिया करने के लिए सच्चे मन से धन्यवाद!
मेरी अन्य विधाएँ पढ़ने के लिए इन पृष्ठों को भी देखें।
तख़लीक़-ए-नज़र | गुलाबी कोंपलें