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times readजैसे शोला बुझती आग में भड़कता रहा
मैं कमरे में बैठा खोया रहा तेरे ख़्यालों में
और चौखट का दरवाज़ा खड़कता रहा
जैसे कभी बरखा के बादल बरसते नहीं
वैसे वो सारा दिन बर्क़-सा कड़कता रहा
तुमने जिसे बेजान समझ के ठुकरा दिया
वो दिल तेरे बाद तेरे नाम से धड़कता रहा
वक़्त गुज़रा किया पल-पल आदतन, पर'
फिर भी वो लम्हा आँख-सा फड़कता रहा
शब्दार्थ:
1. कष्ट या दु:ख; 2. पश्चाताप
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लेखन वर्ष: २००५



















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