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चाँद, बादल और शाम
तख़लीक़-ए-नज़र

हर गाम एक मंज़िल है

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ज़िन्दगी तेरे साथ से क्या मिला जुज़1 तन्हाई के
हर गाम2 इक मंज़िल है लोग मिले रुसवाई के

अब भरोसा ही उठ गया दुनिया के लोगों पर से
अहले-जहाँ3 कब क़ाबिल थे सनम तेरी भलाई के

चाक जिगर यूँ फड़का कि तड़प के फट गया
ऐजाज़े-रफ़ूगरी4 कैसा तागे टुट गये सिलाई के

वो फ़ज़िर5 के रंग वो शाम का हुस्न अब कहाँ
चंद कुछ निशान थे सो मिट गये तेरी ख़ुदाई के

हिज्र6 के रंग में सराबोर7 हैं अब मेरी रातें
काँटों के बिस्तर पे बिताता हूँ अब दिन जुदाई के

करवटें बदल-बदल के मेरी रातें गुज़रती हैं
नसीब नहीं अब मुझे हुस्न तेरी अँगड़ाई के

शब्दार्थ:
1. मात्र; 2. क़दम; 3. दुनिया वाले; 4. रफ़ूगरी का जादू; 5. भोर; 6. विरह; 7. भीगी
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लेखन वर्ष: २००४
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तख़लीक़-ए-नज़र | गुलाबी कोंपलें

21 टिप्पणियाँ

अच्छी गज़ल..बधाई!


jindagi me inshan sab kuchh jante huye bhi kisi se wo umid kar beithta hai jo ki itana bharosa apne aap pe nahi karta is liye use ek achh inshan ho te huye bhi thik usi ruswaiya thokare miltati milati rahati hain. leki wo kya kare akhir inshan jo thahra . aapki gazal me wo sachai hain jo aaj ki inshaniyat se ruba-ru karati hain


vikrant


वाह..विनय जी
लाजवाब है हर शेर............ख़ास कर आकरी शेर ............करवटें बदल बदल..........


achhe khayaalaat ...badhayeee..


arsh


ek ek shabd dil ko chhu jata hai... bahut achcha likha hai aapne...


sunder rachna ke liye badhai.


विनय जी।
कमाल है।
आपने हिन्दी के साथ उर्दु साहित्य को भी धन्य कर दिया है।


विनयजी क्या कहूँ मेरे पास तो आपके लिये एक ही शब्द है लाजवाब आपकी कलम को सलाम्


... प्रभावशाली गजल, सभी शेर दमदार हैं ।


bahut hi sundar rachna hai....har ek shabd dil ko cheer jaata hai....
kisi aur "vinay" ko itna acha likhte hue pehli baar dekha hai...


अपने सभी सुधी पाठकों का शुक्रिया...


खूबसूरत और भावपूर्ण रचना। भाई वाह।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com


vinay bhai,
bahut behtar rachna.
dil se badhaai


श्यामल जी और प्रेम साहब बहुत-2 शुक्रिया!


Good Morng. Vinay ji,

Bahut sundar likha hain aapny.


bahut hi umda ghazal hai...nihaayat hi khoobsoorat shabdo ka prayog huaa hai...

ek vichaar hai ki akhiri pankti zara ajeeb lag rahee hai..."husn teri angdayee ke" atpata lagta hai zaraa,aisa mujhe mahsoss hua


mahi aur sajal jee shukriyaa, aapke vichaaron kaa swaagat hai!


गम्भीर एवं प्रेम में डूबी हुई रचना।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }


तुम्हारे सर आज्माइशो इम्तिहांम का भूत है
हम हैं तेरे तालिब दिल् तलबगार है तुमसे
बहुत लाजवाब शेअर है पूरी गज़ल ही लाजवाब है बधाई



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