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चाँद, बादल और शाम
तख़लीक़-ए-नज़र

मसाइले-इश्क़ से छूटा तो उलझा दुनिया में

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रोशन है इस तरह दिले-वीराँ1 में दाग़ एक
उजड़े नगर में जैसे जले है चराग़ एक*

मसाइले-इश्क़2 से छूटा तो उलझा दुनिया में
ख़ुदा की नवाज़िश है कि बख़्शा दमाग़3 एक

मैं तो मर ही जाता मगर उसने मरने न दिया
मुझमें रह गयी नाहक़ हसरते-फ़राग़4 एक

करम मुझ पर करो शीशाए-दिल5 तोड़कर मेरा
कि यह महज़ है दर्द से भरा अयाग़6 एक

वो किसके दिल में जा बसा है छोड़कर मुझे
नूरे-इलाही!7 उसके बारे में दे मुझे सुराग़ एक

उसके लगाव ने ठानी है ज़िन्दगी जीने की चाह
याख़ुदा8 तू ऐसे हर लगाव को दे लाग9 एक

कोई आता नहीं यूँ तो मेरे घर की तरफ़ फिर भी
जाने किसको सदा दिया करता है ज़ाग़10 एक

ख़ुदा बुलबुल के नाले हैं चमन में गुल के लिए
काश तू देता मुझे आशियाँ11 के लिए बाग़ एक

कम जिये ज़िन्दगी को और ज़िन्दगी थी बहुत
'नज़र' बुझती हुई जल रही है आग एक

*मीर का शे'र माना जाता है, नामालूम किसका शे'र है
1. वीरान दिल में; 2. इश्क़ की समस्याएँ; 3. दिमाग़, brain 4. सुख और शान्ति की इच्छा; 5. दिल रूपी शीशा; 6. प्याला; 7. ईश्वर सही रास्ता दिखा!; 8. ऐ ख़ुदा; 9. दुश्मनी; 10. कौआ, Crow; 11. घर, घोंसला, nest

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लेखन वर्ष: २००५
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तख़लीक़-ए-नज़र | गुलाबी कोंपलें

27 टिप्पणियाँ

bahut hi khoobsoorat gazal
har sher mein ek jadoo sa hai.


Bahut khubsurat..... saare aashar dil ko chhu jaate hai.....


गजल अच्छी है।
शब्दावली सच्ची है।


bahut umda, vinay sabhi sher khubsurat. badhai.


कुछ सदायें होती हैं, जो जिंदगी का पीछा नहीं छोड़ती


वाह विनय भाई बहोत ही कठिन मगर खुबसूरत काफिये के साथ बहोत ही खूबसूरती से आपने उतने ही खूबसूरती से अपना हक़ अदा किया है ... मकते का क्या कहने वेसे तो सारे ही शे'र दाद के काबिल है मगर मक्ता मेरी हालत बयान कर रहा है ... ढेरो बधाई आपको...


अर्श


हमेशा की तरह लाजवाब...

......शुक्रिया


बहुत खूब।

वैसे अक्‍सर मसाइले इश्‍क भी दुनिया से उलझने का कारण बन जाता है।
-----------
मॉं की गरिमा का सवाल है
प्रकाश का रहस्‍य खोजने वाला वैज्ञानिक


Bahut achchi Ghazal lagi .. taqreeban share pasand aaye .. khaaskar "masaile-ishq" ayr "koii aata nahin". Prashn aakhri kaafiye per - "daagh" mein "gh" hai, aag mein sirf "g" hota hai. Can we use it like this? In Urdu I believe the letters would be different.

God bless
RC


hamesha ki tarah lajavab gazal hai abhar


vinay ji deri se aane ke liye maafi ..

aapne bahut hi sundar gazal likhi hai .. padhkar bahut aanand aa gaya .. dusara sher bahut hi jabardasht hai ..

bhai dil se badhai sweekar karen ..

vijay
http://poemsofvijay.blogspot.com


स्याह पन्ने पे फैली रोशनी है,
नज़म भी है, ग़ज़ल भी, यह blog एक.

बहुत खूब , विनय जी .


जी RC जी ग़ज़ल नियमों की दृष्टि से ग और ग़ के प्रयोग भी त्रुटि देखी जा सकती है लेकिन भावना और धुन इनका प्रयोग नहीं नकारती। मैं वही लिखता हूँ जिस बात को लिखना है इस बात के लिए मैं कभी-कभी नियमों को अनदेखा कर देता हूँ। शुक्रिया!

मेरे सभी पाठकों का सहृदय धन्यवाद।


Vihay ji
Gahri rachna likhi hai...........urdoo par aapka poora adhikaar hai


पहली पंक्ति से "दर्द से भरा अयाग एक " तक भाव का एक सूत्र पकड़ में आ रहा है ! लेकिन फिर बात बदल गयी गयी है ! क्या इस शैली में हर पंक्ति का अपना अलग असम्पृक्त अर्थ होता है ??


शुक्रिया दिगम्बर जी, आर्जव तुमको ई-पत्र लिख दिया है।


pyaar me dub jaana hi jindagi ka maksad ..log kahte hai ki pyaar hi sabkuchh hai ..koi saath nahi de to bhi pyaar hi jaannat hai ..
aap ne to kamaal kar diya ..meri or se badhaai lete jayiye ...


आपका ब्लाग बहुत सुन्दर है और ग़ज़लें और भी सुन्दर।

शुभकामनाएं


mark ji, mukul ji & pratishtha ji aap sabhi ka dhanywaad!


प्रिय विनय /मोहम्मद तकी अर्थात मेरे तकी 'मीर' की बहुत गजल ऐसी हैं जिनमे उनका तखल्लुस नहीं लिखा हैजो आम तौर पर गजल की विधा में लिखा जाता है और इस आख़री शेर जिसमे ;शायर का नाम आता है शायद मक्ता या ऐसा ही कुछ कहा जाता हैमीर साहेब की प्रसिद्द गजल जिसे बेगम अख्तर ने गया है 'उल्टी हो गईं सब तदबीरें 'में भी मीर साहेब का नाम प्रयुक्त नहीं हुआ हैइनकी ;शायरी की तारीफ तो ग़ालिब साहिब और जौक साहिब ने भी की है /ग़ालिब साहिब ;ने तो यहाँ तक कहा है -मुझे पूरा याद नहीं पर ऐसे कुछ कहा है कि तुम ही उस्ताद नहीं हो ग़ालिब कहते हैं पिछले ज़माने में कोई मीर भी थाहो सकता है शेर मीर साहिब ;का ही हो


पहली लाइन में मीर तकी की जगह मेरे तकी टाईप हो गया है मुझे सुधारना नहीं आता कृपया सुधार दें


ब्रिज जी, यह मीर साहेब के तख़ल्लुस लगाने या न लगाने की बात नहीं है जिन लोगों ने पुराने उर्दू काव्यों पर शोध किये उनका मानना है कि इस ज़मीन में मीर की कोई ग़ज़ल नहीं है, इन शोध कर्ताओं में से एक हैं अली सरदार जाफ़री, उनकी सम्पादित पुस्तक दीवान-ए-मीर (हिन्दी संस्करण)देखें।

धन्यवाद!


प्रिय विनय /आपके आदेश के पालन में मैं वह पुस्तक जिसका आपने लिखा है जरूर देखूँगा /वैसे मैंने कहीं ऐसा पढ़ा है किअंजुमने -तरक्की -ए-उर्दू के मंत्री डाक्टर अब्दुल हक़ ने खोज कर एक पुस्तक का प्रकाशन कराया है 'जिक्रे मीर 'जिसके वाबत बताया गया है कि यह स्वम मीर साहिब की लिखी हुई है


@ ब्रिजमोहन साहेब, मीर तक़ी मीर के सारे दीवान मौजूद हैं और कुछ तज़्करे भी। हो सकता है अगर बाज़ार में यह किताब मौजूद है तो ज़रूर खरीदने की सोचेंगे।

धन्यवाद


बहुत ही शानदार ग़ज़ल!


बहुत अच्छी अभिव्यक्ति



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