रहोगे उदास तुम भी इसी तरह
Thursday, November 05, 2009
रहोगे उदास तुम भी इसी तरह
गर प्यार हुआ तुम्हें मेरी तरह
जुदाई के दिन मर-मरके काटूँ
भली बात करता है वो बुरी तरह
फ़िराक़1 में बेचैनी न विसाल2 में सुकूँ
आराम नहीं इस दिल को किसी तरह
ग़ालियाँ देते हो तुम कितने प्यार से
बात तो हो तुमसे चाहे इसी तरह
तबाह हूँ तो चर्ख़3 की मरज़ी से हूँ
क़हर बरपे हैं हमपे कई तरह
आशिक़ों ने सहें हैं सितम माशूक़ के
मगर कौन था जाँ-बलब4 मेरी तरह
शब्दार्थ:
1. बिछोह, separation, 2. मिलन, intimacy, 3. आसमान,ईश्वर, Sky, God, 4. जिसके होंटो पर जान हो
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लेखन वर्ष: २००४
गर प्यार हुआ तुम्हें मेरी तरह
जुदाई के दिन मर-मरके काटूँ
भली बात करता है वो बुरी तरह
फ़िराक़1 में बेचैनी न विसाल2 में सुकूँ
आराम नहीं इस दिल को किसी तरह
ग़ालियाँ देते हो तुम कितने प्यार से
बात तो हो तुमसे चाहे इसी तरह
तबाह हूँ तो चर्ख़3 की मरज़ी से हूँ
क़हर बरपे हैं हमपे कई तरह
आशिक़ों ने सहें हैं सितम माशूक़ के
मगर कौन था जाँ-बलब4 मेरी तरह
शब्दार्थ:
1. बिछोह, separation, 2. मिलन, intimacy, 3. आसमान,ईश्वर, Sky, God, 4. जिसके होंटो पर जान हो
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लेखन वर्ष: २००४
जी मेरा सीने में कुछ सिमटता है
Friday, September 04, 2009
जी मेरा सीने में कुछ सिमटता है
एक नया सवाल-सा उठता है
हमें ख़ुद रंज आप-से आता है
क्यों सुकूँ दम-ब-दम घटता है
रात नींद नहीं आती देर तक
नब्ज़-नब्ज़ लम्हा कटता है
किताबों में लिखते हैं तेरा नाम जो
वो कब मिटाये से मिटता है
तुझे निकालना चाहता हूँ दिल से
तो दिल से दिल और सटता है
इश्क़ से तो नहीं हूँ मैं वाक़िफ़
दिल को शोला-सा कुछ लिपटता है*
*यह शे’र मिर्ज़ा रफ़ी ‘सौदा’ का है
---
लेखन वर्ष: २००४
एक नया सवाल-सा उठता है
हमें ख़ुद रंज आप-से आता है
क्यों सुकूँ दम-ब-दम घटता है
रात नींद नहीं आती देर तक
नब्ज़-नब्ज़ लम्हा कटता है
किताबों में लिखते हैं तेरा नाम जो
वो कब मिटाये से मिटता है
तुझे निकालना चाहता हूँ दिल से
तो दिल से दिल और सटता है
इश्क़ से तो नहीं हूँ मैं वाक़िफ़
दिल को शोला-सा कुछ लिपटता है*
*यह शे’र मिर्ज़ा रफ़ी ‘सौदा’ का है
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लेखन वर्ष: २००४
ना लाओ ज़माने को तेरे-मेरे बीच
Wednesday, August 19, 2009
ना लाओ ज़माने को तेरे-मेरे बीच
दिल का रिश्ता है तेरे-मेरे बीच
तंगिए-दिल से पहलू को छुटाओ
गरज़ को न लाओ तेरे-मेरे बीच
लख़्ते-दिल आँखों से रिसते हैं
ये फ़ासला क्यों है तेरे-मेरे बीच
किसी ग़ैर के कहे पे मत जाना तुम
हैं आज ग़ैर क्यों तेरे-मेरे बीच
जलता है मेरा कलेजा तुम बिन
इक अफ़साना है तेरे-मेरे बीच
ख़ुदा जाने मेरा दर्दे-दिल
जो आग है बुझा दो तेरे-मेरे बीच
---
लेखन वर्ष: २००४
दिल का रिश्ता है तेरे-मेरे बीच
तंगिए-दिल से पहलू को छुटाओ
गरज़ को न लाओ तेरे-मेरे बीच
लख़्ते-दिल आँखों से रिसते हैं
ये फ़ासला क्यों है तेरे-मेरे बीच
किसी ग़ैर के कहे पे मत जाना तुम
हैं आज ग़ैर क्यों तेरे-मेरे बीच
जलता है मेरा कलेजा तुम बिन
इक अफ़साना है तेरे-मेरे बीच
ख़ुदा जाने मेरा दर्दे-दिल
जो आग है बुझा दो तेरे-मेरे बीच
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लेखन वर्ष: २००४
हम जितना करते हैं, ग़लत करते हैं
Saturday, August 01, 2009
हम जितना करते हैं, ग़लत करते हैं
गर सही भी करते हैं तो ग़लत करते हैं
तुमको बतायेगा कौन ख़ुदा भी पत्थर है
जी को लगाते हैं तुमसे’ ग़लत करते हैं
तुम अपने नाज़ से न फिरोगे हम ख़ुद से
नाज़ उठाते हैं तुम्हारा ग़लत करते हैं
इश्क़ में जलकर ख़ाक़ हो जायेंगे हम
हम जलते हैं इश्क़ में ग़लत करते हैं
करते हैं ग़ैर से अपने दिल का हाल बयाँ
जान-बूझकर काम ये ग़लत करते हैं
तुमको चीरकर अपना दिल दिखा देंगे
‘नज़र’ हम जो करते हैं ग़लत करते हैं
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लेखन वर्ष: २००४
गर सही भी करते हैं तो ग़लत करते हैं
तुमको बतायेगा कौन ख़ुदा भी पत्थर है
जी को लगाते हैं तुमसे’ ग़लत करते हैं
तुम अपने नाज़ से न फिरोगे हम ख़ुद से
नाज़ उठाते हैं तुम्हारा ग़लत करते हैं
इश्क़ में जलकर ख़ाक़ हो जायेंगे हम
हम जलते हैं इश्क़ में ग़लत करते हैं
करते हैं ग़ैर से अपने दिल का हाल बयाँ
जान-बूझकर काम ये ग़लत करते हैं
तुमको चीरकर अपना दिल दिखा देंगे
‘नज़र’ हम जो करते हैं ग़लत करते हैं
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लेखन वर्ष: २००४
तुमको नफ़रत है मुझसे
Friday, July 24, 2009
तुमको नफ़रत है मुझसे, मुझको क़रार है तुमसे
तन्हा मिलो मुझसे कभी' कहूँ प्यार है तुमसे
तुम चलते हो मुझसे मुँह फेर के जाने किस बात पे
हालत मेरी नीयत दिल की असरार1 है तुमसे
ज़माने भर के काम आज निपटाने हैं मुझ एक को
तुम साथ दो निपट जायेंगे इक़रार है तुमसे
बहुत पाक था दिल मेरा बहुत पाक है आज भी
तुम कहते हो गुनाहगार तो गुनाहगार है तुमसे
तुम्हारे सर आज़माइशो-इम्तिहाँ का भूत है
हम हैं तेरे तालिब2 दिल तलबगार है तुमसे
हम तो डूबे हैं सर से पाँव तक तेरे इश्क़ में
इश्क़ मेरा सबा में बहता है जो नमूदार है तुमसे
शब्दार्थ:
1. Secret, भेद; 2. Willing(person), इच्छुक
तन्हा मिलो मुझसे कभी' कहूँ प्यार है तुमसे
तुम चलते हो मुझसे मुँह फेर के जाने किस बात पे
हालत मेरी नीयत दिल की असरार1 है तुमसे
ज़माने भर के काम आज निपटाने हैं मुझ एक को
तुम साथ दो निपट जायेंगे इक़रार है तुमसे
बहुत पाक था दिल मेरा बहुत पाक है आज भी
तुम कहते हो गुनाहगार तो गुनाहगार है तुमसे
तुम्हारे सर आज़माइशो-इम्तिहाँ का भूत है
हम हैं तेरे तालिब2 दिल तलबगार है तुमसे
हम तो डूबे हैं सर से पाँव तक तेरे इश्क़ में
इश्क़ मेरा सबा में बहता है जो नमूदार है तुमसे
शब्दार्थ:
1. Secret, भेद; 2. Willing(person), इच्छुक
वो जिसे इश्क़ कहता था
Thursday, July 16, 2009
वो जिसे इश्क़ कहता था वाइज़1 हम उसमें फँस गये
बहाये इतने आँसू कि जहाँ खड़े थे वहीं धँस गये
न जिगर से लहू बहा न लब तक अपनी बात आयी
गिरियाँ2 दिल ही में बादल बने वहीं बरस गये
रह-रहके रूह छोड़ना चाहती थी इस ज़ोफ़3 बदन को
इतना चाहते हैं तुम्हें कि मरने तक को तरस गये
कोई पढ़ दे मेरा नसीब हमको क्या-क्या बदा4 है
हमें लगता है हम जहाँ-जहाँ भी गये अबस5 गये
किस तरह से भूलें तुमको किस तरह से भुलायें
दिल, जान, ख़्याल और तस्व्वुर6 में तुम बस गये
दिल लिया तुमने ग़म नहीं बारहा7 जान क्यों लेते हो
फिर गुज़रे सामने से और फिर मुझपे हँस गये
शब्दार्थ:
1. धर्मोपदेशक, 2. आँसू, 3. कमज़ोर, 4. निश्चित, 5. व्यर्थ, 6. याद, 7. बार-बार
बहाये इतने आँसू कि जहाँ खड़े थे वहीं धँस गये
न जिगर से लहू बहा न लब तक अपनी बात आयी
गिरियाँ2 दिल ही में बादल बने वहीं बरस गये
रह-रहके रूह छोड़ना चाहती थी इस ज़ोफ़3 बदन को
इतना चाहते हैं तुम्हें कि मरने तक को तरस गये
कोई पढ़ दे मेरा नसीब हमको क्या-क्या बदा4 है
हमें लगता है हम जहाँ-जहाँ भी गये अबस5 गये
किस तरह से भूलें तुमको किस तरह से भुलायें
दिल, जान, ख़्याल और तस्व्वुर6 में तुम बस गये
दिल लिया तुमने ग़म नहीं बारहा7 जान क्यों लेते हो
फिर गुज़रे सामने से और फिर मुझपे हँस गये
शब्दार्थ:
1. धर्मोपदेशक, 2. आँसू, 3. कमज़ोर, 4. निश्चित, 5. व्यर्थ, 6. याद, 7. बार-बार
अगर आँख रोये और दिल सिसकियाँ भरे
Tuesday, July 07, 2009
अगर आँख रोये और दिल सिसकियाँ भरे
तो भला बोलो आशिक़ ऐसे में क्या करे
इक वो दिन था इक ये आज का दिन है
मर्ज़ी ख़ुदा की ज़ख़्म भर दे या हरा करे
तुमको मतलब नहीं आशिक़ की नज़र से
चाहे तुम्हें देख के वो सौ आहें भरा करे
तुम रहो बुत की तरह से पत्थर-दिल
और मेरा दिल तेरे लिए धड़का करे
आग जो है तेरे हुस्न की शरर1 से है
शरर क्यों जलाये मुझको क्यों जला करे
बेचैनियाँ देके तुम मुझको ख़ुश रहते हो
हो जाये तुम्हें भी इश्क़ ख़ुदा करे
शब्दार्थ:
1. चिंगारी, fire spark
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लेखन वर्ष: २००४
तो भला बोलो आशिक़ ऐसे में क्या करे
इक वो दिन था इक ये आज का दिन है
मर्ज़ी ख़ुदा की ज़ख़्म भर दे या हरा करे
तुमको मतलब नहीं आशिक़ की नज़र से
चाहे तुम्हें देख के वो सौ आहें भरा करे
तुम रहो बुत की तरह से पत्थर-दिल
और मेरा दिल तेरे लिए धड़का करे
आग जो है तेरे हुस्न की शरर1 से है
शरर क्यों जलाये मुझको क्यों जला करे
बेचैनियाँ देके तुम मुझको ख़ुश रहते हो
हो जाये तुम्हें भी इश्क़ ख़ुदा करे
शब्दार्थ:
1. चिंगारी, fire spark
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लेखन वर्ष: २००४
जन्नत में न लगा जी तो किधर जायेंगे
Tuesday, June 30, 2009
जब तक तेरी तमन्ना करेंगे जीते जायेंगे
वरगना दम तोड़ देंगे मर जायेंगे
तुमने जो कहा तो मर भी जाना है हमको
जन्नत में न लगा जी तो किधर जायेंगे
इश्क़ में बहुत सीमाब है दिल मेरा
कितना सहेंगे हम हद से गुज़र जायेंगे
तुम हो ख़ुश्बू और मैं मानिन्दे-गुल हूँ
तुम नहीं हो तो हम टूटकर बिखर जायेंगे
तुम मान लो मेरी बात को सच वगरना
साबित कर देने को हम ज़हर खायेंगे
जो तुमको चाहा है हमने पूरे दिल से
तुम नहीं आते इधर तो हम उधर आयेंगे
---
लेखन वर्ष: २००४
वरगना दम तोड़ देंगे मर जायेंगे
तुमने जो कहा तो मर भी जाना है हमको
जन्नत में न लगा जी तो किधर जायेंगे
इश्क़ में बहुत सीमाब है दिल मेरा
कितना सहेंगे हम हद से गुज़र जायेंगे
तुम हो ख़ुश्बू और मैं मानिन्दे-गुल हूँ
तुम नहीं हो तो हम टूटकर बिखर जायेंगे
तुम मान लो मेरी बात को सच वगरना
साबित कर देने को हम ज़हर खायेंगे
जो तुमको चाहा है हमने पूरे दिल से
तुम नहीं आते इधर तो हम उधर आयेंगे
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लेखन वर्ष: २००४
मोहब्बत ने सदा की तो
Tuesday, June 16, 2009
मोहब्बत ने सदा की तो दुनिया का डर निकल गया
बदन में साँसों का बुझा हुआ इक चराग़ जल गया
बे-दर्द के दिल में दर्द का असर यूँ देखा आज
मेरे इक आँसू की गर्मी से उसका दिल पिघल गया
तेरे रूप को बेसुध तकता रहा मैं बरसों तक
इस हुस्न के आगे हर ख़ुर्शीदो-माह ढल गया
तेरी आँखों ने फ़िज़ा को जाने किस अदा के साथ देखा
चार-सू बेज़ार-सा एक मौसम बहार में बदल गया
तेरे प्यार की छाँव ने मुझे सहारा इस तरह दिया
कि तेरी ख़ुशी का साया मेरे हर ग़म को छल गया
बड़ी बेताबी थी आठों पहर कश्मकश का समा था
तेरे मुस्कुराने भर से ही बेताब दिल बहल गया
ग़ालिब से कहो जाकर उसने सच कहा था इक रोज़
'नज़र' के दिमाग़ में भी पड़ इश्क़ का ख़लल गया
शब्दार्थ:
ख़ुर्शीदो-माह: सूरज और चाँद, सदा: पुकारना
---
लेखन वर्ष: २००४
बदन में साँसों का बुझा हुआ इक चराग़ जल गया
बे-दर्द के दिल में दर्द का असर यूँ देखा आज
मेरे इक आँसू की गर्मी से उसका दिल पिघल गया
तेरे रूप को बेसुध तकता रहा मैं बरसों तक
इस हुस्न के आगे हर ख़ुर्शीदो-माह ढल गया
तेरी आँखों ने फ़िज़ा को जाने किस अदा के साथ देखा
चार-सू बेज़ार-सा एक मौसम बहार में बदल गया
तेरे प्यार की छाँव ने मुझे सहारा इस तरह दिया
कि तेरी ख़ुशी का साया मेरे हर ग़म को छल गया
बड़ी बेताबी थी आठों पहर कश्मकश का समा था
तेरे मुस्कुराने भर से ही बेताब दिल बहल गया
ग़ालिब से कहो जाकर उसने सच कहा था इक रोज़
'नज़र' के दिमाग़ में भी पड़ इश्क़ का ख़लल गया
शब्दार्थ:
ख़ुर्शीदो-माह: सूरज और चाँद, सदा: पुकारना
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लेखन वर्ष: २००४
वो हमसे' हम उनसे रूठते हैं बेवज़ह
Monday, June 01, 2009
मेरा दिल पत्थर था तुझ पर दीवाना हुआ
दीवानगी में लग के ख़ुद से अंजाना हुआ
तेरी सूरत में जो देखा न देखा था आज तक
लाले पड़े जान के ईमान का भी जुर्माना हुआ
हाए किस अदा के साथ देखा तुमने मुझे
बिस्मिल1 तेरा तीरे-नज़र का निशाना हुआ
मैंने तुम्हें देखा तुम मुझे देखकर मुस्कुराये
बस इसलिए मशहूर यह अफ़साना हुआ
भड़कीं दोनों जानिब इश्क़ की चिंगारियाँ
ख़ुतूत2 के ज़रिए अब इश्क़ फ़रमाना हुआ
वो हम से' हम उन से रूठते हैं बेवज़ह
अब रोज़ उनसे अपना रूठाना मनाना हुआ
शराब की तरह होता है यह इश्क़ भी
बढ़िया उतना ही हुआ जितना कि पुराना हुआ
दर-ब-दर भटकता था किस जुस्त-जू3 में
कैसा मक़ाम है यह तेरे दिल में ठिकाना हुआ
जल रहा है शबो-रोज़ एक आरज़ू लिए
तेरे दिल की शमा पे मेरा दिल परवाना हुआ
तौबा की थी इक रोज़ मोहब्बत से मगर
तेरी लगन में मेरा यह दिल आशिक़ाना हुआ
बेतरह बेमक़सद जी रहा था मैं ज़िन्दगी
ख़ुश हूँ आज चलो मरने का तो बहाना हुआ
और ज़िन्दगी में क्या कीजिए महज़ इश्क़
इसलिए तुमसे अपने दिल का लगाना हुआ
बेवफ़ा नहीं हूँ और न ही करता हूँ झूठे वादे
इक बार किया वादा मर के भी निभाना हुआ
तुमने चुरा लिया मेरा दिल सबके सामने
अबकि बार मुझको तेरा चैन चुराना हुआ
अब दिल के सभी दाग़ दिखा देंगे हम तुमको
कि तेरी पैमानाए-निगाह को छलकाना हुआ
बड़े ढीठ हो कि सुनते नहीं मेरा हाले-दिल
कि तेरा हाथ पकड़ के मुझको तो सुनाना हुआ
अजनबी हो आज मगर होगे आश्ना भी
किसी तरह तो मुझे तेरा दिल धड़काना हुआ
शब्दार्थ:
बिस्मिल: घायल ; ख़ुतूत: एक से ज़्यादा ख़त ; जुस्त-जू: तलाश।
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लेखन वर्ष: २००४
दीवानगी में लग के ख़ुद से अंजाना हुआ
तेरी सूरत में जो देखा न देखा था आज तक
लाले पड़े जान के ईमान का भी जुर्माना हुआ
हाए किस अदा के साथ देखा तुमने मुझे
बिस्मिल1 तेरा तीरे-नज़र का निशाना हुआ
मैंने तुम्हें देखा तुम मुझे देखकर मुस्कुराये
बस इसलिए मशहूर यह अफ़साना हुआ
भड़कीं दोनों जानिब इश्क़ की चिंगारियाँ
ख़ुतूत2 के ज़रिए अब इश्क़ फ़रमाना हुआ
वो हम से' हम उन से रूठते हैं बेवज़ह
अब रोज़ उनसे अपना रूठाना मनाना हुआ
शराब की तरह होता है यह इश्क़ भी
बढ़िया उतना ही हुआ जितना कि पुराना हुआ
दर-ब-दर भटकता था किस जुस्त-जू3 में
कैसा मक़ाम है यह तेरे दिल में ठिकाना हुआ
जल रहा है शबो-रोज़ एक आरज़ू लिए
तेरे दिल की शमा पे मेरा दिल परवाना हुआ
तौबा की थी इक रोज़ मोहब्बत से मगर
तेरी लगन में मेरा यह दिल आशिक़ाना हुआ
बेतरह बेमक़सद जी रहा था मैं ज़िन्दगी
ख़ुश हूँ आज चलो मरने का तो बहाना हुआ
और ज़िन्दगी में क्या कीजिए महज़ इश्क़
इसलिए तुमसे अपने दिल का लगाना हुआ
बेवफ़ा नहीं हूँ और न ही करता हूँ झूठे वादे
इक बार किया वादा मर के भी निभाना हुआ
तुमने चुरा लिया मेरा दिल सबके सामने
अबकि बार मुझको तेरा चैन चुराना हुआ
अब दिल के सभी दाग़ दिखा देंगे हम तुमको
कि तेरी पैमानाए-निगाह को छलकाना हुआ
बड़े ढीठ हो कि सुनते नहीं मेरा हाले-दिल
कि तेरा हाथ पकड़ के मुझको तो सुनाना हुआ
अजनबी हो आज मगर होगे आश्ना भी
किसी तरह तो मुझे तेरा दिल धड़काना हुआ
शब्दार्थ:
बिस्मिल: घायल ; ख़ुतूत: एक से ज़्यादा ख़त ; जुस्त-जू: तलाश।
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लेखन वर्ष: २००४
हर गाम एक मंज़िल है
Wednesday, May 20, 2009
ज़िन्दगी तेरे साथ से क्या मिला जुज़1 तन्हाई के
हर गाम2 इक मंज़िल है लोग मिले रुसवाई के
अब भरोसा ही उठ गया दुनिया के लोगों पर से
अहले-जहाँ3 कब क़ाबिल थे सनम तेरी भलाई के
चाक जिगर यूँ फड़का कि तड़प के फट गया
ऐजाज़े-रफ़ूगरी4 कैसा तागे टुट गये सिलाई के
वो फ़ज़िर5 के रंग वो शाम का हुस्न अब कहाँ
चंद कुछ निशान थे सो मिट गये तेरी ख़ुदाई के
हिज्र6 के रंग में सराबोर7 हैं अब मेरी रातें
काँटों के बिस्तर पे बिताता हूँ अब दिन जुदाई के
करवटें बदल-बदल के मेरी रातें गुज़रती हैं
नसीब नहीं अब मुझे हुस्न तेरी अँगड़ाई के
शब्दार्थ:
1. मात्र; 2. क़दम; 3. दुनिया वाले; 4. रफ़ूगरी का जादू; 5. भोर; 6. विरह; 7. भीगी
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लेखन वर्ष: २००४
हर गाम2 इक मंज़िल है लोग मिले रुसवाई के
अब भरोसा ही उठ गया दुनिया के लोगों पर से
अहले-जहाँ3 कब क़ाबिल थे सनम तेरी भलाई के
चाक जिगर यूँ फड़का कि तड़प के फट गया
ऐजाज़े-रफ़ूगरी4 कैसा तागे टुट गये सिलाई के
वो फ़ज़िर5 के रंग वो शाम का हुस्न अब कहाँ
चंद कुछ निशान थे सो मिट गये तेरी ख़ुदाई के
हिज्र6 के रंग में सराबोर7 हैं अब मेरी रातें
काँटों के बिस्तर पे बिताता हूँ अब दिन जुदाई के
करवटें बदल-बदल के मेरी रातें गुज़रती हैं
नसीब नहीं अब मुझे हुस्न तेरी अँगड़ाई के
शब्दार्थ:
1. मात्र; 2. क़दम; 3. दुनिया वाले; 4. रफ़ूगरी का जादू; 5. भोर; 6. विरह; 7. भीगी
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लेखन वर्ष: २००४
वक़्त गुज़रा किया पल-पल आदतन
Wednesday, May 06, 2009
मैं ईज़ा1 में पड़ा नदामत2 को तड़पता रहा
जैसे शोला बुझती आग में भड़कता रहा
मैं कमरे में बैठा खोया रहा तेरे ख़्यालों में
और चौखट का दरवाज़ा खड़कता रहा
जैसे कभी बरखा के बादल बरसते नहीं
वैसे वो सारा दिन बर्क़-सा कड़कता रहा
तुमने जिसे बेजान समझ के ठुकरा दिया
वो दिल तेरे बाद तेरे नाम से धड़कता रहा
वक़्त गुज़रा किया पल-पल आदतन, पर'
फिर भी वो लम्हा आँख-सा फड़कता रहा
शब्दार्थ:
1. कष्ट या दु:ख; 2. पश्चाताप
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लेखन वर्ष: २००५
जैसे शोला बुझती आग में भड़कता रहा
मैं कमरे में बैठा खोया रहा तेरे ख़्यालों में
और चौखट का दरवाज़ा खड़कता रहा
जैसे कभी बरखा के बादल बरसते नहीं
वैसे वो सारा दिन बर्क़-सा कड़कता रहा
तुमने जिसे बेजान समझ के ठुकरा दिया
वो दिल तेरे बाद तेरे नाम से धड़कता रहा
वक़्त गुज़रा किया पल-पल आदतन, पर'
फिर भी वो लम्हा आँख-सा फड़कता रहा
शब्दार्थ:
1. कष्ट या दु:ख; 2. पश्चाताप
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लेखन वर्ष: २००५


















